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Hindi Poem - आत्मवाद





कलम से   

आत्मवाद  

इक प्रश्न मन में उठ रहा , कुछ यूँ है मुझसे पूछता... 
तुम राग क्या अलापते ? तुम व्यंग क्यूँ हो साधते? 
  
क्यों रूष्ट हुए मुझसे बोलो ? क्यूँ मौन आज तेरी वाणी ? 
क्यों इतना मायूस हुआ तू ? क्यूँ सूखा मुँह का पानी? 

इक प्रश्न मन में उठ रहा ...... 

मै बात वहाँ की बतलाऊ , जब प्रश्न ये भीतर आया था | 
ऐसा लग रहा था मानो , विष से तूने मुझको नहलाया था | 
विचारो का संघर्ष ये कैसा ? फूट डालने आया था.. 
मलीन कर दिया देह को, ये कैसा षड़यंत्र् रचाया था..? 
 इक प्रश्न मन में उठ रहा ....... 

आलिंगन क्यों दिया पीड़ाओ कोये कैसा बोझ उठाया था? 
सुख बाटने की कोशिश मेंतूफान दुखो का आया था , 
क्यों प्रतिकार किया हर चुनौती का ? रक्त चक्षुओ से बह आया था.... 

कि इक प्रश्न मन में उठ रहा... 

क्यों शांत नही हुआ फिर भी ये मनज्ञान को मस्तक से छटकाया था | 
पूछ रहा हूँ प्रश्न मै फिर से.. आकाल ये कैसा आया था? 
इस मंथन का परिणाम है कैसा ? ये कैसा अनुभव पायेगा...? 

कि इक प्रश्न मन में उठ रहा. ....इक प्रश्न मन में उठ रहा .... 

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